मीडिया के दलालीकरण के नतीजे-इमरान नियाजी

2016-11-29 08:15:44.0

मीडीया/पत्रकारिता यानी एक ऐसा स्तम्भ जो इन्साफ, कमजोर, गरीबों की आवाज बुलन्द करता हो, जो सच को सबके सामने लाता हो, सच्चाई और इन्साफ की वकालत करता हो। एक जमाना था जब पत्रकार सच्चाई उजागर करते थे, कमजोर और गरीबों के हक की आवाज उठाते थे, इन्साफ की वकालत करते थे। सच्चे और निस्वार्थ पत्रकार की लड़ाई ही मौजूदा सरकार से रहती थी। हमें अच्छी तरह याद है कि 70 के दशक में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में '' भ्रष्ट लोगों की दुनिया '' नाम से एक साप्ताहिक अखबार प्रकाशित होता था, इसके प्रकाशक व सम्पादक थे श्री राजपाल सिंह राणा। राजपाल सिंह राणा एक ऐसा नाम जिसकी परछाई से भी भ्रष्ट कांप उठते थे। उस समय अगर कोई पत्रकार किसी सरकारी दफ्तर की तरफ से गुजर जाता तो पूरे कार्यालय में सन्नाटा छा जाता था। अफसर हो या कर्मचारी सब राइट टाइम दिखाई पड़ते थे। लेकिन आज पत्रकार महोदय बीच में बैठकर लेनदेन कराते दिखाई पड़ते हैं, ऐसे ही पत्रकार अफसरों कर्मचारियों और नेताओं को असली लगते हैं और जो दलाली नहीं करते वे सब फर्जी। जो दलाली नहीं करते उनसे अफसरान कहते हैं कि हमने तो कभी देखा नहीं। अजीब तमाशा है, दलाली न करो तो फर्जी कहलाओ। बात यह है कि जो पत्रकार दलाली नहीं करते वे बेवजह ही अफसरों की चमचागीरी नहीं करते इसलिए उन्हें दिखाई नहीं पड़ते। आज हर शख्स सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार का रोना रोता है, जबकि सच यह है कि असल भ्रष्टाचार तो मीडिया में है। एक दौर था जब मीडिया भ्रष्टाचार पर निगरानी करती थी लेकिन आज खुद ही भ्रष्टाचार की फैक्ट्री बन चुकी है। खुद को नम्बर वन, बड़ा और वीआईपी कहने वाले अखबार चैनल पत्रकार केवल प्रशासन, नेताओं सरकार को खुश करने की कोशिशों में लगे हैं। 95 फीसद मीडिया आरएसएस की पालतू है, घटनाओं को घुमाओ देकर खबर देने में दिन रात एक किये हुए है। पत्रकारिता में छिछोरों की भीड़ भर गयी। मामला चाहे असल आतंकियों का हो या साजिश का शिकार बनाये गये बेगुनाहों का हो, फर्जी मुठभेढ़ की बात हो या पुलिसिया लूट की, पुलिस द्वारा उगाही का विषय हो या राजमार्गों पर रंगदारी वसूली (टौलटैक्स) का, झूठे मुकदमे लादने का मामला हो या कार्यवाही की गुहार लगाते भटकते फिरने वाले गुलाम हिन्दोस्तानियों का, आजकल मोबाईल एप्स व्हाट्सअप पर पत्रकार नामी लोग ग्रुप बनाने में लगे है इन ग्रुपों में खबरों और जानकारियों का आदान प्रदान करने की बजाये जहर उगलने में लगे है या छिछोरी हरकते करने में। दो दशक से देखा जा रहा है कि मीडिया कर्मियों पर हमलों की तादाद में इजाफा हुआ है। कोई थप्पड़ मार देता है तो कोई गालियां सुना देता है जिसका जब मन चाहा झूठे मुकदमे लाद दिये, यहां तककि अब तो हद हो गयी कि पत्रकारों को कत्ल किया जाने लगा। अब वक्त आ गया यह समझने का कि मीडिया पर हमले क्यों बढ़ते जा रहे हैं, क्यों मीडिया इतनी कमजोर हो गयी कि जो नेता मीडिया से घबराया करते थे वे मीडिया पर हमलावर हो गये? काफी दिमागी कसरत करने के बाद साफ हुआ कि इन सब हालात के लिए खुद मीडिया कर्मी ही पूरी तरह से जिम्मेदार है। मीडिया में दलाली चमचागीरी के चलन के बाद सक ही मीडिया का स्तर गिरता चला गया। आजकल देखा जा रहा है कि पत्रकार का चोला पहनकर दलाली करने वाले की बल्ले बल्ले है, दलाली ओर चमचागीरी करने वालों को ही अफसरान पहचानते हैं। कुछ दिन पहले ही उ0प्र0 के कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह ने पत्रकारों से अपनी जय जयकार कराने के लिए सिर्फ मौखिक घोषणा करदी कि सूबे में पत्रकारों को सरकारी रंगदारी वसूली यानी टौलटैक्स से छूट रहेगी, बात घोषणा तक ही रह गयी, इसके बाद केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी पत्रकारों को टौल से छूट की बात की हालांकि गडकरी ने बात को अमली जामा पहनाया लेकिन उसमें खेल यह खेला कि यह छूट सिर्फ दलालों और चमचों को ही मिलेगी, सब को नहीं। रेल/जहाज में रिजर्वेशन हों या विदेश यात्रा के लिए पासपोर्ट की बात हो, विधानसभाओं ओर संसद भवन में प्रवेश का मामला हो या सचिवालयों या अन्य स्थानों में घुसने का, हर मोड़ पर खादी वर्दी खिलाडि़यों यहां तक कि फिल्म जगत के लोगों को कोटा छूट सब दिया जाता है लेकिन पत्रकार को चोर उचक्कों की तरह ही रखा जाता है यहां तककि जेल में भी खादी वर्दी पुंजिपतियों को सम्मान दिया जाता है ओर पत्रकार को उसकी औकात बताई जाती है। इन सब की खुली वजह है पत्रकारों में छोटा बड़ा ऊंच नीच हिन्दू मुस्लिम के भेदभाव का चलन और दलाली चमचागीरी का प्रकोप।


पत्रकारों को अपना खोया हुआ मान सम्मान दुबारा हासिल करने के लिए अपनी सोच बदलनी होगी, दलाली ओर चमचागीरी छोड़नी होगी, बड़े छोटे, असली फर्जी, ऊंच नीच, हिन्दू मुस्लिम का भेदभाव मिटाकर एक जुट होकर नेताओं, अफसरों, की कवरेज, कान्फ्रेंस, आदि बन्द करके हर मामले हकीकत खोजकर हकीकत को ही पेश करना होगा, अपराधिक मामलों में पुलिसिया कहानी को ही पेश करने की बजाये खुद मामले की जांच करके पेश करनी होगी, कुल मिलाकर पत्रकारों को पत्रकार बनना होगा, पूरी तरह से निगेटिव मुद्रा में आना होगा, तब ही कुछ वजूद बच सकता है सिर्फ संगठन बनाने, ज्ञापन देने धरना प्रदर्शन करने से कुछ नहीं होने वाला। हमारे कुछ साथियों का कहना है कि हम लाला (अखबार/चैनल के मालिक) की नोकरी कर रहे है तो जो वे चाहते हैं वेसा ही लिखते हैं इसपर हमारा कहना है कि लाला की दुकान हमसे चलती है हम लाला की दुकान से नहीं चलते, इसलिए हम सिर्फ सच्चाई ही पेश करें, सोचिये अगर सभी पत्रकार बन्धु एक राय हो जाये तो लाला की दुकान कैसे चलेगी।


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