बलात्कार, धर्मपरिवर्तन के बहाने नई साजि़श

2017-02-07 12:20:51.0

सन् 1990 के दशक से आरएसएस और आरएसएस पोषित मीडिया इस्लाम, इस्लामी मदरसों, मस्जिदों और मुसलमानों के खिलाफ पूरी ताकत के साथ नई से नई साजिशें करती आ रही है। वह चाहे बाबरी मस्जिद के खिलाफ हो या गोधरा की साजिश, समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद, दरगाह अजमेर, दिल्ली हाई कोर्ट धमाके हो या कर्नाटक केरल में धमाकों का मामला हो, कश्मीर के लोगों को आतंकी बताकर मार गिराने की साजिश होे, शहीद हेमन्त करकरे का कत्ल हो या अफजल गुरू को ठिकाने लगाने की साजिश, बिहार के महाबोधि धमाकों की बात हो या मुजफ्फरनगर बवाल का बहाना, आरएसएस पोषित पुलिस और मीडिया मुसलमान, इस्लाम, मस्जिद, मदरसों को बदनाम करने कोई मौका नहीं छोड़ रही। आतंक से जोड़ने की भरपूर कोशिशें की गयी किसी हद तक कामयाब भी होते रहे, लेकिन भला हो शहीद हेमन्त करकरे का कि जिन्होनें देश में धमाके करने वाले असली आतंकियों को बेनकाब कर दिया, कुछ आतंकियों को जेल भी भिजवा दिया। हेमन्त करकरे की यह बड़ी गलती थी कि उन्होंने आरएसएस पोषित कानून के विपरीत काम किया यानी देश में होने वाले धमाकों के असली कर्ता धर्ताओं में से कुछ आतंकियों को बेनकाब कर दिया, हालांकि शहीद करकरे को उनकी इस गल्ती की सज़ा भी आतंकियों ने जल्दी ही देदी, आरएसएस गुलाम कानून को मौका मिला और हेमन्त करकरे के कत्ल का इल्जाम भी अजमल कस्साब पर ही आसानी से थोप दिया। क्योंकि आतंकी अच्छी तरह जानते थे कि देश में दूसरा हेमन्त नहीं है जो हेमन्त के असल कातिलों को बेनकाब करे। धर्मनिर्पेक्षता के झूठे लेबल में लिपटे धर्म आधारित कानून ने तो मुसलमान, इस्लाम, मदरसों, मस्जिदों को आतंकी घोषित करने की अपनी कारगुजारी में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी मगर उलटे हर बार बम, बारूद मन्दिरों और विद्या मन्दिरों से ही बरामद हुए। कानून ने सैकड़ों मुसलमानों को आतंकी बताकर मार गिराया, जेलों में सड़ाया, मनमाना जुल्म किया और हर बार कानून की कार गुजारियों को मजबूती देने के लिए आरएसएस की रखैल बन चुकी मीडिया ने आरएसएस की साजि़शों को ताकत दी। मीडिया ने हर बार ऊपर नीचे का ज़ोर लगाया कि फंसाये गये मुस्लिम को ठिकाने लगा दिया जाये, लेकिन कहावत है कि "झूठ के पैर ही कितने होते हैं" साकार होती रही और झूठे फंसाये गये मुस्लिमों को कुदरत बचाती रही। मिसाल के तौर पर प्रो0 गिलानी को फंसाकर बदनाम करने में मीडिया के दल्लों ने नीचे ऊपर का जोर लगा दिया। लेकिन गिलानी की किस्मत अच्छी थी कि वे बच गये, अफजल गुरू को तो लगा ही दिया ठिकाने। अकबरउददीन ओवैसी बोले तो जज साहब को भी यूट्यूब देखने का शौक हो जाता है, असम और बर्मा में आतंकी मुसलमानों का कत्लेआम करें और उसका दुख फेसबुक पर आये तो फेसबुक बन्द करने की बिल्बिलाहट होती है, जबकि इसी फेसबुक और यूट्यूब पर मुसलमानों और इस्लाम के खिलाफ किस हद तक आतंक मचाया जा रहा है कुछेक गुण्डो ने तो फेसबुक पर बाकायदा पेज बना रखे हैं, आजतक किसी को फेसबुक देखने या यूट्यूब देखने की फुर्सत ही नहीं मिल रही, अभी हाल ही में कुछ आतंक परस्त खुलेआम इस्लाम और उसके मानने वालों के खिलाफ लेख आतंक फैला रहे हैं लेकिन किसी को नहीं चुभ रहा। अगर बात सिर्फ बलात्कार की ही करें तो नजर उठाकर देखिये हर रोज हजारों मामले बलात्कार के होते हैं साथ ही कुछ मामलों में बलात्कार के बाद हत्या के मामले भी होते हैं किसी को आरएसएस गुलाम मीडिया में जगह नहीं मिलती, एक दो मामले खबरों में आते भी हैं तो मामूली तौर पर सिर्फ एक दिन, उसके बाद बात खत्म। औरैया के ग्राम जौरा में रिटायर्ड फौजी ने किशोरी को अपने घर में बुलाकर जबरण दुष्कर्म किया, गुजरे दिनों लखीमपुर जिले में कई मामले बलात्कार के हुए, बरेली जिले में एक दर्जन से ज्यादा केस हुए, रामपुर जिले में तीन केस हुए, ओरैया में एक हफ्ते में नौ केस हुए कोई भी मामला मीडिया को पसन्द नहीं आया, बरेली में ही गुजरे महीने दर्जन भर से ज्यादा मामले हुए जिनमें तीन मामले मामूली तौर पर मीडिया में आये बाकी को मीडिया में जगह नहीं मिली। एक दो मामलों की मामूली तौर पर खबर लगी और बात खत्म। लेकिन मदरसों को आतंक से जोड़ने की साजिशें नाकाम होने के बाद अब मदरसों को बलात्कार से जोड़ने का जो ड्रामा तैयार किया गया उसे मीडिया ठीक उसी तरह से उछालने में लगी है जिस तरह प्रो0 गिलानी को आतंकी घोषित करने की साजिश के तहत उछाला था। गुजरे लगभग एक महीने के दौरान आरएसएस ने इस्लाम के खिलाफ "बलात्कार और धर्म परिर्वतन" नामक नई मुहिम की शुरूआत कर दी है। इस्लाम, मुसलमानों, मस्जिदों और मदरसों को आतंक से जोड़ने की कोशिशों में नाकाम होने के बाद आरएसएस ओर उसकी पालतू मीडिया इस्लाम और उसके मानने वालों को बलात्कार एंव जबरन धर्म परिवर्तन के नाम से बदनाम करने की कोशिशों में लग गयी है। मेरठ से शुरू हुई साजिश जंगल की आग की तरह चारों तरफ फैलती जा रही है आरएसएस और उसकी पालतू मीडिया उन महिलाओं लड़कियों को तलाश रही है जिन्होंने वर्षों पहले किसी मुस्लिम से रास लीलायें की फिर शादियां करलीं। अब उन को बहला फुसलाकर लालच देकर बगावती सुर निकलवाये जा रहे है। अभी तक जितनी भी महिलाओं ने इस तरह के नाटक खड़े किये है वे लगभग सभी अपनी मर्जी से रास लीलाओं के बाद शादियां करके बैठी हैं। मगर मजबूरी यह है कि अब हेमन्त करकरे तो रहे नहीं जो सारी हकीकत खोलकर रख देते। बस इसी के चलते आरएसएस और आरएसएस की पालतू मीडिया को पूरा मौका मिल गया है साजिशें करने का। बार बार मदरसों को आतंकी ठिकाने कहती रही मीडिया, और हर बार बम बारूद मन्दिरों और विद्या मन्दिरों से बरामद हुए, जब जब मन्दिरों से अस्लाह बारूद बरामद हुआ तब तब मीडिया डरी हुई कुतिया की तरह दुम दबाकर अपनी इज्जत बचाती दिखाई पड़ी। इस्लाम मस्जिदों मदरसों को आतंक से जोड़ने की कोशिशें एक बड़ी हद तक नाकाम होने पर आरएसएस गुलामों ने इस बार इस्लाम, मदरसों को बलात्कार से जोड़ने की मुहिम छेड़ दी इसकी शुरूआत एक बड़ी नाटकीय ढंग से मेरठ से करके देश के दूसरे कोनों तक ले जाई जा रही है। परेशानी देने वाली बात यह है कि अब हेमन्त करकरे तो रहे नहीं जो कि इस साजिश को भी बेनकाब कर देते। वे ही इकलौते ऐसे इमानदार जांच अधिकारी थे जिन्हें आरएसएस न खरीद सकी न ही डरा सकी, यह और बात है कि एक बड़ी साजिश रचकर उन्हें ठिकाने लगा दिया गया। अब सवाल यह है कि बलात्कार व धर्मपरिर्वतन नाम की इस साजिश का पर्दाफाश कैसे हो हेमन्त करकरे तो रहे नहीं, कौन करेगा साजिश को बेनकाब। कहां से लाया जाये दूसरा हेमन्त ? शायद हेमन्त करकरे की गैर मौजूदगी का ही पूरा फायदा उठाया जा रहा है। पूरे देश को गुजरात बनाने की साजिश रची जा रही है। इस बार गोधरा की जगह बलात्कार और धर्मपरिवर्तन का सहारा लिया जा रहा है। गौरतलब बात यह है कि जिस जिस महिला के सहारे साजिशें की जा रही हैं उनमें 98 फीसद वे महिलायें हैं जो कई कई साल पहले से मुस्लिमों के साथ पत्नी बनकर रह रही हैं, अपनी इच्छाओं से ही मुसलमानों के साथ शादियां की हैं। दो-चार, पांच-दस साल तक मुसलमान बनकर रहने के बाद अब अचानक उन्हें मालूम हुआ कि जिस पति के साथ वे रह रही है उसने उनका जबरन धर्मपरिर्वतन कराया है। दो-चार, पांच दस साल पहले जिन मुस्लिमों से उन्होंने शादियां की कई कई बच्चे पैदा कर लिए तो अब दोबारा धर्मपरिवर्तन क्यों करायेगा कोई ? इस्लाम के नियम के मुताबिक बिना इस्लाम कबूल किये निकाह नहीं हो सकता, इससे यह तो साफ हो जाता है कि इन महिलाओं ने पहले ही धर्मपरिवर्तन कर लिया है। तो अब "जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप क्यों लगाने लगीं" ? जाहिर सी बात है कि उन्हें बहलाया फुस्लाकर ड्रामें रचे जा रहे हैं।
Created on Tue, 09 Sep 2014

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