फिर जिन्दा हो गयेे एहसान फरामोश बेशर्म माननीय

2017-02-06 03:47:04.0

फिर जिन्दा हो गयेे एहसान फरामोश बेशर्म माननीय

निवर्तमान विधायकों के कामों का आंकलन करने लगा है मतदाता

क्षेत्र की जनता लगा रही है कई आरोप

अभी भी नहीं छूट रहा है महंगी गाड़ियों का मोह

उरई (राहुल गुप्ता) विधानसभा चुनाव जिसमें अब मतदाता पूर्व और निवर्तमान विधायकों के कामों का आंकलन करने में जुट गया है और उनका यह भी कथन है कि जो प्रत्याशी विभिन्न-विभिन्न पार्टियों से मैदान में हैं वह जीत के बाद दिखाई नहीं पड़े और जब उन्हें हाईकमान ने दोबारा मौका दिया तो वह हाथ जोड़कर मैदान में आ डटे। ऐसे में कहीं मतदाता उन्हें मुंह की खाने को मजबूर न कर दे।
पूर्व में कालपी से विधायक रहे छोटे सिंह व निवर्तमान विधायक उमाकांति सिंह, उरई से निवर्तमान विधायक दयाशंकर वर्मा व उरई क्षेत्र से पूर्व में विधायक रहे विनोद चतुर्वेदी जो कि पुनरू चुनाव मैदान में हैं। इन लोगों ने क्षेत्र में कितने विकास कार्य कराए हैं इसका आंकलन अब मतदाता करने में जुट गया है और मतदाताओं का यह भी कथन है कि जब भी प्रत्याशी विधायक बना तो उसने दोबारा गली और मेरा दरवाजा झांकने का प्रयास नहीं किया। ऐसी परिस्थितियों में आज भी हम लोग जस के तस हाल में खड़े हुए हैं। एक विधायक को पांच साल में इतनी धनराशि विकास के लिए दी जाती है कि वह अगर अपने क्षेत्र में विकास कराने पर तुले तो शायद कोई मतदाता उनके ऊपर आरोपों की बौछार नहीं कर सकता है। पांच साल पूरे होने के उपरांत जिनको टिकट पार्टी द्वारा दिए गए हैं वह अब अपने हैंडपंप और अन्य विकास कार्यों को गिना रहे हैं अगर वास्तविकता से इनके कार्यों का अवलोकन किया जाए तो एक नहीं कई छेद नजर आएंगे। सपा विधायक जो कि पुनरू कांग्रेस गठबंधन से मैदान में उतरे हैं वहीं अन्य दलों से भी ऐसे प्रत्याशी मैदान में आए हैं जो विकास की दुहाई दे रहे हैं। सन् 2007 से अब तक के इन प्रत्याशियों की अगर हैसियत का आंकलन लगाया जाए तो एक बड़ा परिणाम सामने नजर आएगा। इतना ही नहीं ये सारे पूर्व व निवर्तमान विधायक आज लग्जरी गाड़ियों से घूम रहे हैं और इनके पास आय-व्यय के इतने साधन हो गए हैं कि अब वह बिना वैभव के रहना पसंद नहीं करते। यही वजह है कि बसपा सपा और भाजपा कांग्रेस में टिकट पाने के लिए जो नूराकुश्ती होती रही उससे अब तक प्रत्याशियों की तस्वीर साफ नहीं हो पाई थी। पहले सपा ने महेंद्र कठेरिया को टिकट देकर मौजूदा सपा प्रत्याशी निवर्तमान विधायक दयाशंकर वर्मा को हाशिए पर डाल दिया था परंतु ऐनकेन प्रकारेण ये टिकट पाने में सफल हो गए जिससे यह बात तो साफ हो गई कि हाईकमानों पर भी धीरे-धीरे कार्यकर्ताओं का विश्वास डोलने लगा है। वहीं बसपा कांग्रेस और सपा में कई दलबदलू टिकट पाने के लिए शामिल होते रहे। ऐसे में वह अपने क्षेत्र का क्या विकास कराएंगे इन सब पहलुओं पर मतदाता बड़ी बारीकी से विचार कर रहा है और उसका आंकलन भी है कि ऐसे प्रत्याशी को चुनाव जिताना चाहिए जो वास्तविक रूप से अपने विकास को छोड़कर जनता के विकास में रुचि ले। हालांकि टिकटों के वितरण को लेकर जिस तरह से हर दल में अभी भी नाराजगी है और जो महीनों और वर्षों से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थे पार्टियों के आलाकमानों ने उन्हें मौखिक रूप से हामी भर दी थी। आखिरी समय पर उनको ऐसी दुलत्ती मारी कि वह मैदान से बाहर हो गए। इन चारों पार्टियों में दुलत्ती खाए नेताओं ने अन्य दलों में अपनी पहचान बनाने के लिए पार्टियों के आलाकमानों से हाथ मिलाया अगर इन पार्टियों का पूर्व का इतिहास उठाकर देेख लिया जाए तो ऐसे कई नेता नजर आएंगे जो कि अब चुनाव लड़ना तो छोड़ो मंच पर चढ़ने लायक नहीं रहे।

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