अब चोधरी को हराने में लगा रहे हैं पैसा

2017-02-11 12:53:11.0

अब चोधरी को हराने में लगा रहे हैं पैसा

वर्षों से अपने निर्माण कार्य के भुगतान को तरस रहे ठेकेदार

टिकट में लगी दो करोड़ की दण्डवत पार्टी के वोट बैंक तक सीमित

अधिप्रतिशत मुस्लिम मत भी शायद काम न आये

मतदाता मानने लगे नगर पालिका स्तर का नेता चोधरी को

उरई-जालौन (राहुल गुप्ता) कांग्रेसी घराने में जन्म लेने वाले विजय चोधरी पढ़े लिखे युवा हैं। अपनी तमाम पढ़ाई लिखाई और अच्छे संस्कार के चलते उन्होंने सबसे पहले अपने जन्मजात कांग्रेसी घराने को लात मारी और बहुजन समाज पार्टी से राजनीतिक यात्रा शुरू की। जिसके चलते जिस आवास पर दशकों से कांग्रेस का तिरंगा फहराता रहा उसपर उन्होंने बसपा का नीला परचम फहरा दिया। इस सब में उनके कुटुम्बीजनों को भी कोई आपत्ति नहीं हुयी। ठीक भी था जिसका जहां मन हैं जिसे जो विचारधारा पसंद है वह वहां जाये। फिर नई पीढ़ी से मूंह जोरी करना तब घर के कांग्रेसी बुजुर्गों को भी उचित नहीं लगा। किन्तु जब अपनी तमाम महत्वाकांक्षा के चलते विजय चैधरी ने राजनीतिक गुरू बृजलाल खाबरी को ही कम करने की कोशिश की तो वह वहां से कथित रूप से बसपा से लतिया दिये गये और फिर तमाम दलों में ठिकाना तलाश करते रहकर तथा उरई सुरक्षित सीट से विधायक निर्वाचित होने का सपना पूरा नहीं कर पाये।
उन्होंने उरई से विधायक बनने के लिये घर से नीला परचम उतार फेंकने के साथ पहले भाजपा का ध्वज फहराया, फिर जनता दल यूनाईटेड का ध्वज तथा फिर कांग्रेस का ध्वज भी फहराया। किन्तु जब तक बृजलाल खाबरी बसपा का नीला परचम उठाये रहे विजय चैधरी वहां एन्ट्री नहीं पा सके। अब जब बृजलाल खाबरी ने कांग्रेस का ध्वज थाम लिया तो विजय जो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के उरई रोड शो के समय उनकी गाड़ी के ऊपर अनी बत्तीसी दिखाते हुये हाथ हिलाते हुये अवाम का अभिवादन करने में गौरव की अनुभूति कर रहे थे अचानक बसपा नेत्री मायावती के सम्मुख जा पहुंचे और दो करोड़ बार दण्डवत करने के साथ उरई सुरक्षित सीट से टिकट पाने में सफल हो गये। उरई से बसपा प्रत्याशी होकर उरई-जालौन सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र को उरई नगरपालिका का चुनाव मानने जैसी भूल उन्हें मंहगी पड़ सकती है। क्योंकि उरई नगर पालिका परिषद के तमाम वह ठेकेदार जिनके लाखों रुपये के भुगतान वह दो वर्ष से लटकाये हुये हैं और उन्होंने उन्हें तमाम कर्ज में डुबोकर दर-दर का भिखारी तथा पागल जैसा बना दिया है। वह तो कभी नहीं चाहेंगे उरई नगर से ही जीत हासिल हो सके। वह तो उनकी चुनावी नैया को उन नालों में ही डुबो देना चाहेंगे जिनके निर्माण का भुगतान उन्हें अब तक नहीं मिला है और ब्याज पर पैसा लेकर उन्होंने उनका निर्माण कार्य कराया है। हां विजय चैधरी के चुनाव में उनके पार्टनर रहे ठेकेदारान और ईओ रवीन्द्र कुमार निजा यहां वोट भी नहीं है जरूर 10-20 वोटों की मदद जरूर कर सकते हैं।

बसपा प्रत्याशी फिर वह किसी भी सीट से क्यों न हो अपने भीतर बसपा के स्थाई वोट बैंक के साथ मुस्लिम समाज के एकमुश्त वोट प्राप्त कर जीत की उम्मीद लगाये बैठा हैं। इन प्रत्याशियों में विजय चैधरी प्रथम पायदान पर खुद को मानते हैं। किंतु उरई-जालौन सुरक्षित सीट पर बसपा का चमार वोट निर्णायक स्थिति में नहीं है। जहां तक मुस्लिम वोट की बात है तो वह अधिप्रतिशत में उस प्रत्याशी के पक्ष में जाता है जो भाजपा प्रत्याशी को पराजित करता नजर आ रहा हो। उरई सीट पर मौजूदा सातों प्रत्याशी अपनी जाति, धर्म और लोकप्रियता के पैमाने के साथ बता रहे हैं कि भाजपा प्रत्यााशी गौरीशंकर वर्मा अपने सजातीय कोरी समाज के वोट तथा अनेक बार विधानसभा चुनाव में पराजय से उत्पन्न अकूत सिम्पैथी वोट प्राप्त करते हुये जीत की ओर अग्रसर हैं। वहीं सपा ने जिस रणनीति के तहत महेंद्र कठेरिया को अपना प्रत्याशी घोषित किया उससे बसपा प्रत्याशी विजय ै ही सबसे ज्यादा हलकान नजर आ रहे है। उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि अल्पसंख्यक मतदाताओं पर सपा की मजबूत पकड़ है लिहाजा उस पकड़ को चाहकर भी कमजोर नहीं कर पायेंगे यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। जबकि इसके विपरीत बहुजन मुक्ति मोर्चा, भारतीय शक्ति चेतना पार्टी, स्वतंत्र जनता राज पार्टी, राष्ट्रीय विकलांग पार्टी को बहुत कम मतों तक सिमट जाना है। इस तरह बसपा यहां मुस्लिम मत प्राप्त करने के साथ अपने आधार चमार वोट का शत प्रतिशत मत पाकर भी गौरीशंकर वर्मा के निकट नहीं पहुंचती नजर आ रही है और विजय चैैधरी को नगर पालिका स्तर का नेहा ही बनाये रखने का सामान सामने रख रही हैं इस तरह से संभवतः विजय चैधरी भी अपनी पराजय की हैडट्रिक लगाते नजर आ रहे हैं। विजय चैधरी की पराजय सुनिश्चित कराने के लिये सपा प्रत्याशी महेंद्र कठेरिया के साथ जिस तरह से सपा व कांग्रेस नेताओं ने एकजुटता प्रदर्शित की है उससे बसपा खेमे में हड़कंप मचा हुआ है। यही कारण है कि बसपा प्रत्याशी विजय चैधरी के प्रचार वाहनों में जो समर्थक जनसंपर्क करने जाते हैं उनके चेहरों पर हार का भय स्पष्ट रूप से मतदाता भांप भी रहे हैं।
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