दलबदल के एक्सपर्ट विजय को हाथी की सवारी के सपने

2017-02-12 14:17:27.0

दलबदल के एक्सपर्ट विजय को हाथी की सवारी के सपने

पिछले विधानसभा चुनाव में 55 दिन मे तीन पार्टी बदलने से विजय से लोगों का घटा था विश्वास

लोकसभा चुनाव कांग्रेस से तो अब विधानसभा चुनाव लड़ रहे है बसपा से

उरई-जालौन (राहुल गुप्ता) जब गुजरे विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्व नगर पालिकाध्यक्ष विजय चोधरी ने केवल पचपन दिन मे तीन पार्टियों को बदलकर लोगों के सामने जनपद में एक नया उदाहरण ही पेश नहीं किया था, बल्कि उनके टिकट की लालसा को लेकर दल बदलने की इस महत्वाकांक्षा ने लोगों के मन से उनका विश्वास भी खो दिया था और विधानसभा चुनाव में तीर चलाते हुए पूर्व पालिकाध्यक्ष को मुँह की खानी पड़ी और उन्हें हार का सामना करना पड़ गया था। यही नहीं विजय चोधरी की महत्वाकांक्षा यही खत्म नहीं हुई उन्होंने लोकसभा चुनाव में भी कई पार्टियों से टिकट लेने की कोशिश की लेकिन अंत में उन्हें कांग्रेस का प्रत्याशी बनाया गया और लोकसभा चुनाव में भी विजय को पराजय का मुँह देखना पड़ गया ।

अब फिर से पूर्व पालिकाध्यक्ष विजय चोधरी ने विधानसभा चुनाव में राजनैतिक पार्टियों के गलियारों के चक्कर लगाए और राजनैतिक गुरुओं का आशीर्वाद लेकर बसपा से प्रत्याशी बनकर चुनाव मैदान में जोर आजमाइश करने लगे है लेकिन लगातार दल बदलने के कारण उनकी जिस तरह की छवि जनता के बीच में आई है उससे उन्हें अपनी जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है ।

आपको बता दे कि पूर्व पालिकाध्यक्ष विजय चोधरी ने राजनैतिक कैरियर की शुरूआत बसपा से की थी। एक समय बसपा की राजनीति के केन्द्र विन्दुओ मे एक रहे विजय चोधरी ने बसपा के पूर्व राज्य सभा सांसद बृजलाल खाबरी के साथ बेहद चर्चित जोड़ी बनायी लेकिन बढ़ती महत्वाकांक्षा दोनेा के बीच टकराव का कारण बन गयी और कभी छोटे बड़े भाई के रूप मे लोगों के बीच पहचान बनाने वाली जोड़ी फिर एक दूसरे की कटटर विरोधी नजर आने लगी। पूर्व में हुए विधानसभा चुनाव में लम्बी खीचतान के बाद जब पूर्व चैयरमेन गुट बेहद कमजोर सावित होने लगा तेा आखिरकार विजय चोधरी ने भाजपा का दामन थाम केसरिया झण्डा थाम लिया। विजय चैधरी ने जब बसपा छोड़ भाजपा का दामन पकड़ा तो उनको पार्टी के कुछ कददावर लोगों द्वारा उरई विधान सभा क्षेत्र से टिकट का आश्वासन दिया था लेकिन जब भाजपा के टिकट वितरण शुरू हुआ तो इस पूर्व चैयरमेन के अरमान विना निरमा के पानी मे धुल गये और उरई से भजपा प्रत्यासी के रूप मे गौरीशंकर वर्मा का टिकट थमा दिया गया। गौरीशंकर वर्मा को टिकट मिलने पर पूरे 55 दिनों बाद विजय चैधरी ने तत्काल प्रभाव से भाजपा को अलविदा कहने मे हिचक नही दिखायी और केसरिया रंग उतारकर तीर चलाने की ठान जनता दल यू का दामन थाम लिया। और सिर्फ टिकट के लिये जनता दल यू मे सामिल हो गये। केवल पचपन दिन मे तीन पार्टियों को बदलकर चुनावी मैदान मे कूंदने से आम लोगों की नाराजगी वह मोल ले बैठे और उरई विधान सभा से जनता दल से प्रत्यासी बने विजय से लगातार मतदाताओं की बढ़ती दूरियां से विजय चोधरी की रातों की नीदं उड़ गई थी जिसका परिणाम उनके लिए निराशाजनक रहा और उन्हें पिछली विधानसभा चुनाव में हार का मुह भी देखना पड़ गया।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भी वह तीर पर नहीं टिक सके और विजय की बढ़ती महत्वाकांक्षा ने फिर से अंगड़ाई ली और लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया लेकिन भाजपा की आंधी का सामना भी वह नहीं कर पाए और पंजे का दामन थामने के बाद भी उन्हें निराशा हाथ लगी और उनकी जमानत तक जब्त हो गई।

अपने निजी स्वार्थ के चलते लगातार पार्टियां बदलने के कारण आम जनता का भी रुझान अब उनसे हटने लगा है जो वर्तमान विधानसभा चुनाव में भी साफ दिखाई दे रहा है । भले ही विजय चैधरी लोगों को अब विश्वास दिलाने की भरपूर कोशिश कर रहे है कि अब वह बसपा प्रत्याशी के रूप में अपने घर में वापिस आ गए है लेकिन उनकी बाते आम जनता के गले नहीं उतर रही है जिसका परिणाम है जनता का विश्वास खो देने के चलते विजय को इस चुनाव में भी एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है।

'हार की हैट्रिक लगा चुके है विजय चोधरी'

पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष विजय चोधरी भले ही इस विधानसभा चुनाव में बसपा के मजबूत प्रत्याशी के रूप में उरई विधानसभा से चुनाव लड़ रहे है लेकिन उनके इतिहास पर गौर करे तो वह अभी तक अपने नाम से सिर्फ एक चुनाव ही जीत सके है बाकी चुनावों में उन्हें निराशा ही हाथ लगी है। विजय चोधरी ने अपने जीवन का पहला चुनाव वर्ष 2000 में उरई नगर पालिका का लड़ा जिसमे उन्हें ऐतिहासिक जीत भी हुई लेकिन उनके पांच वर्ष के कार्यकाल में नगर पालिका में भ्रष्टाचार की सुगबुगाहट भी सुनाई देती रही, जिसकी समय समय पर जांचे भी होती रही। हालाँकि अधिकारियों में अपनी पैठ बना चुके विजय उन आरोपो से बचते भी रहे। उसके बाद 2007 में विजय ने पुनः नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़ा लेकिन इस बार उन्हें हार का सामना देखना पड़ गया और भाजपा ने जीत दर्ज कराते हुए काशी कोरी विजयी रहे। विजय का मनोबल एक हार पर ही खत्म नहीं हुआ , विजय ने वर्ष 2012 में ही सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव की ओर रुख किया और तीर के सहारे चुनाव लड़ते हुए वह अपनी जमानत तक जब्त करवा बैठे। यही नहीं वर्ष 2012 में नगर पालिका की सीट महिला ( सुरक्षित) के लिए आरक्षित कर दी गई तो विजय ने अपनी माँ श्रीमती गिरिजा चैधरी को चुनाव मैदान में उतारा और इस बार उनकी माँ ने ऐतिहासिक जीत हासिल की । हालाँकि विजय चैधरी नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे है।

नगर पालिका और विधानसभा चुनाव में दो बार हार का मुह देखने के बाद भी विजय ने हार नहीं मानी और विजय वर्ष 2014 में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी बन बैठे और इस बार भी भाजपा की लहर के आगे वह टिक नहीं सके और अपने नाम का प्रयोग करते हुए वह अपने जीवन का तीसरा चुनाव भी हार गए। अब वो वर्तमान में उरई विधानसभा से बसपा के प्रत्याशी बने है । अब देखना है कि अपने नाम से चुनाव हारने की हैट्रिक लगा चुके विजय को आखिर इस बार विजय मिलती है या उन्हें फिर निराशा ही हाथ लगती है । अब जनता ही 23 फरवरी को होने वाले मतदान में इसका फैसला करेगी।

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