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नये मुल्ला शराअे की खुआरी

29 May 2020 5:08 AM GMT

कम इल्म वाले किसी भी कानून को अपने फायदे के हिसाब से मरोड़ने के माहिर होते हैं,

कहते है कि

इस्लाम के पहले इमाम और इल्म का समन्दर यानी हज़रत अली का अलैहिस्सलाम का फरमान है कि

"खामोशी आलिम का ज़ेवर और जाहिल की जहालत का पर्दा है"

मतलब आलिम अगर खामोश रहता है तो उसका इल्म चमकता है, और जाहिल अगर खामोश रहे तो उसकी जहालत छुपी रहती है"

यह बात पूरी तरह ठीक बैठती है बरेली के थाना किला के मोहल्ला घेर शेख मिटठू के फाटक बरकाती की मस्जिद में नमाज़ पढ़ाने वाले इमाम पेशा पर

यह पेशे इमाम ने इस्लाम के कानून को अपने हिसाब से मरोड़ते हुए मस्जिद के मुतावली पर हमला करा दिया,

इसका कहना है कि "आज़ान पढ़ने से पहले पेशे इमाम की इजाज़त लेना ज़रूरी है

हमने इसकी अपनी शरियत को सुनकर बरेली के ही मुफ्ती और मौलवियों से शरीयत का पहलू जानने के लिए बात की,

मुफ्ती मो० मेवान रज़ा कादरी ने बताया

एक दूसरे आलिम डा० इसरार बेग नूरी ने हमें बताया

इस पेशे इमाम की अपनी शरियत सुनने के बाद देखना यह होगा कि बरेली दारूल इफ्ता इसके खिलाफ क्या एकशन लेता है,

क्योंकि मामला शरियत का है और एक पेशे इमाम शख्स अगर इस तरह शरीयत को गलत तरह से बतायेगा तब इसका कौम पर क्या असर पड़ेगा

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