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प्राईवेट लैब / अस्पताल ने डाली दो परिवारों की जाने ख़तरे में

19 May 2020 9:00 AM GMT

योगी के महकमाये सेहत की एक और गैर जिम्मेदाराना करतूत सामने आई

इस बार मामला यूपी के मेरठ जिला का है,

जहां एक प्राईवेट लैब की रिपोर्ट पर ही अंध विश्वास करते हुए स्वास्थ विभाग ने ग्यारह जगह से टूटी हडडियों वाले मरीज़ समेत उसके पूरे परिवार के ना सिर्फ चौदह दिन बरबाद किये बल्कि पूरे परिवार को दिमाग़ी तकलीफ में भी डाला,

वो भी रमज़ान के महीने के चलते,

याद दिलादें कि गुज़रे हफ्ते बरेली में भी प्राईवेट अस्पताल ने कमाई के लिए महेशपुर के ट्रक ड्राईवर ज़ुबैर को कोरोना पॉज़ीटिव बताया था, बरेली प्रशासन ने भी आनन फानन में लाखों रूपये पर पानी फेर दिया,

बताते चलें कि बरेली के ज़ुबैर का भी पैर टूटा हुआ है,

कहावत है कि " हाथी के दांत एक बार बाहर आ गये तो कभी वापिस अन्दर नहीं जाते"

यह कहावत बिलकुल ठीक बैठती है प्राईवेट अस्पतालों पर,

नगर विकास अधिनियम, मेडीकल सर्विसेस रूल्स और सुप्रीम कोर्ट के प्रावधानों को ताख में रखकर कायम कराये गये अस्पतालों के सामने अब बीडीए, और सीएमओ बेबस खड़े नज़र आ रहे हैं,

अस्पतालों की हर तरह की करतूतों को अभयदान देने के लिए भुग्तभोगियों पर लम्बे चौड़े पुलिसिया कानूनों भरी धमकियां लिखे बैनर अस्पतालों मे लगवा दिये गये जिससे इन अस्पतालों की ऊल पटांग हरकतों को पूरी तरह कानून छूट दे दी गई,

सभी नियम, कानून, कोर्ट आर्डर को अशोक की लाट के नीचे दफ्न करके बनवाये जा रहे अस्पतालों को देखने के लिए सिर्फ अकेले बरेली की ही तस्वीर देखें तो बरेली पूरी तरह अस्पतालों की मण्डी में तबदील बन चुकी है,

दो तीन अस्पतालों को छोड़कर सभी छोटे बड़े अस्पताल आबादी की गोद में ही कायम किये गये है, तस्वीरों मे आप देख ही रहे हैं, बीच आबादी में बनवाये गये अस्पताल

याद दिलादें कि नव्वे के दशक में बरेली के एक मुहल्ले के बीचो बीच एक अस्पताल बनवाया गया, बीडीए नें "आबादी के बीच अस्पताल नहीं बनाया जा सकता" कहते हुए आपत्ति लगाकर नक्शा पास करने से साफ मना कर दिया था,

यह अस्पताल तत्कालीन सत्ताई विधायक का है, और सोने पे सुहागा इस अस्पताल की ओपनिंग तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को करनी थी,

पहले तो सत्ताई विधायक का अस्पताल दूसरे मुख्यमंत्री के हाथों उदघाटन होना,

जला दिये गये सारे नियम कानून और रातों रात बीडीए ने नक्शा पास कर दिया,

साथ ही फायर ब्रिगेड ने घर बैठे एनओसी भी विधायक को पहुंचा दी

अगर नियम कानून और सुप्रीम कोर्ट के आर्डर की ही बात करें

तो बरेली के 98 फीसद अस्पतालों के ऑप्रेशन थियेटर, नर्सरी, बेटमेन्ट में नहीं बनाई जा सकती,

लेकिन नोट की चोट पड़ते ही फायर ब्रिगेड के नियम कुचल जाते हैं बाकी रह जाती है तो सिर्फ एनओसी यानी अनापत्ति प्रमाण पत्र,

लेकिन हम दावे के साथ कह सकते हैं कि 98 फीसद अस्पतालों के ओटी और नर्सरी बेसमेन्ट में ही हैं,

मगर अशोक की लाट छपे काग़ज़ की गड्डियां फायर ब्रिगेड, ज़िला प्रशासन, स्वास्थ विभाग को एनओसी और रजिस्ट्रेशन देने पर मजबूर कर देती हैं

अब बात करते है कोरोना की फर्जी पॉज़ीटिव रिपोर्ट देने वालों की.

बरेली और मेरठ के प्राईवेट अस्पतालों और लैबों की,

कोरोना पॉज़ीटिव बताकर इन्होंने ना सिर्फ प्रशासन का वक्त और पैसा बर्बाद किया बल्कि मरीज़ो और उनके परिवारों के हार्डफेल कराने की पूरी तैयारी करी थी, गनीमत रही कि दोनों ही परिवार बच गये

सवाल यह है कि आखिर कब तक और क्यों प्रशासन प्राईवेट अस्पतालों के सामने झुककर कानून नियम और सुप्रीम कोर्ट के डायरेक्शन को कुचलते रहेंगे

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