गुलाम जनता को गुलाम होने का अहसास कराने की बरसी

2017-11-08 10:15:03.0

नोटबंदी के काला दिवस की पहली बरसी पर कुछ ने जश्न मनाया तो बहुतों ने मनाया काला दिवस। लेकिन इस मौके पर जिक्र उनका भी जरूरी है जिनको नोटबन्दी नामक सरकारी हठधर्मी ने मरवा दिया।
बरेली के कांकरटोला निवासी खालिक अहमद खान की जान नोटबंदी की मोदी सरकार की हठधर्मी ने लेली थी, यहां हम बीजेपी की उस महिला नेता को बतादें जिसने बैंकों की लाइनों में लगने वालों के पास काला धन बताया था कि खालिद घर के खर्चे के लिए रुपयों की जरूरत थी, और वह तीन दिन से एटीएम की लाइन में लग रहे थे लेकिन उन्हें रुपये नहीं मिल रहे थे, पिछले साल 16 नवंबर 2016 को ईंट पजाया स्थित एटीएम की लाइन में वह लगे थे उनकी तबयत बिगड़ गई और अस्पताल ले जाते वक्त उनकी मौत हो गई।
खालिक की मौत के बाद परिवार परेशानी में आ गया, उनके भाई असलम खान ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रजिस्ट्री भेजी लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं आया, हां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने परिवार को दो लाख रुपये का चेक भेंट किया।
नोटबंदी के साल गुजरने के साथ देश मामूल पर लौटने लगा है लेकिन उन परिवारों की कमी की भरपाई कभी नहीं हो सकेगी, जिन परिवारों के किसी ना किसी की जान सरकारी हठधर्मी ओर तानाशाही ने ली है।

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