गुरू जी बिना पढ़ाये ही लेते हैं वेतन

2017-01-12 15:15:37.0

गुरू जी बिना पढ़ाये ही लेते हैं वेतन

रामपुरा-जालौन (राहुल गुप्ता) एक तरफ जहां सरकार परिषदीय विद्यालयों के संचालन के नाम पर जिले में करोड़ों रुपये तो केवल शिक्षकों को वेतन देने के नाम पर कर रही तो वहीं निःशुल्क किताबें, डेªस, बस्ता व भोजन खिलाने के नाम पर अलग से बेहिसाब पैसा खर्चा जा रहा है। लेकिन शिक्षा विभाग में नौकरी पाने वाले गुरू अपने कर्तव्यों से विमुख होकर नौनिहालों का भविष्य चैपट कर प्रदेश सरकार की मंशा पर झाड़ू लगाने में जुटे हुये हैं। ताज्जुब की बात तो यह ऐसे विद्यालयों की सच्चाई खंड शिक्षा अधिकारियों को पता रहती हैं लेकिन वह शिक्षकों के साथ हुये फार्मूले का स्मरण कर बीएसए को गुमराह करने से नहीं चूकते।
ऐसा ही रामपुरा विकासखंड के ग्राम कदमपुरा में पूर्व माध्यमिक विद्यालय का प्रकाश में आया जो महीने में दो या तीन दिन ही खुलता है। इसके बाद विद्यालय के गुरू जी 27-28 दिन कहां रहते है इसकी सच्चाई सिवाय खंड शिक्षा अधिकारी के किसी को भी नहीं रहती है। आज बुधवार को मीडिया टीम जब धुर बीहड़ी क्षेत्र के ग्राम कदमपुरा में पहुंची तो वहां के पूर्व माध्यमिक विद्यालय में ताला लटका मिला इतना ही नहीं विद्यालय खुलने के समय वहां पर एक भी छात्र मौजूद नहीं था। जब मीडिया टीम ने ग्रामीणों से विद्यालय बंद होने के बारे में जानकारी चाही तो उन्होंने बताया कि गांव का विद्यालय माह में दो या तीन ही खुलता है बाकी दिनों में विद्यालय में ताला लटकता रहता है। ग्रामीणों का कहना था कि विद्यालय में पदस्थ्य शिक्षकों की खंड शिक्षा अधिकारी से सांठगांठ होने के बाद ही विद्यालय से गायब रहने वाले शिक्षकों के लिये अलग से फार्मूला तैयार कर लिया जाता है। जिसमें खंड शिक्षा अधिकारी को अपनी ड्यूटी से गायब रहने वाले शिक्षक अपने वेतन आहरण कराने के नाम पर एक निर्धारित सुविधा शुल्क देते हैं। यही सुविधा शुल्क खंड शिक्षा अधिकारी की जुबान पर सच्चाई उजागर नहीं होने देता। जब भी कोई ग्रामीण जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी या अन्य आला अधिकारियों को कोई शिकायत करते हंैं तो वह भी खंड शिक्षा अधिकारी के पास पहुंचती है जिसे वह रद्दी की टोकरी में फेंककर ऐसे शिक्षकों के लिये सुरक्षा कवच बनकर ग्रामीणों की शिकायत को झुठलाने या फिर फर्जी तरीके से ग्रामीणों के हस्ताक्षर कर शिकायत का निस्तारण कराने का प्रयास कर बीएसए को गुमराह करने से नहीं चूकते हैं। यही कारण है कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी भी जमीनी सच्चाई से रूबरू नहीं हो पाते और वह भी खंड शिक्षा अधिकारियों की हां में हां मिलाकर लापरवाह शिक्षकों के हित पोषक बनकर रह जाते हैं।

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