होली से पहले होलिका के गांव की खबर, पवित्र त्यौहार का जन्म

2017-03-04 13:30:17.0

होली से पहले होलिका के गांव की खबर, पवित्र त्यौहार का जन्म

(मधुर यादव)

झांसी- होली का त्यौहार आते ही पूरा देश रंग और गुलाल की मस्ती में सराबोर हो जाता है लेकिन शायद बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि पूरी दुनिया को रंगीन करने वाले इस पर्व की शुरुआत झांसी जिले से हुई थी।

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में इस जिले का एरच कस्बा सतयुग में गवाह रहा है हिरणाकश्यप की हैवानियत काए भक्त प्रह्लाद की भक्ति काए होलिका के दहन और नरसिंह के अवतार का। होली यानि रंगों के पर्व का प्रारंभ होलिका दहन से माना जाता है। शा स्त्रों और पुराणों के मुताबिक वर्तमान में झासी जिले का एरच कस्बा सतयुग में एरिकच्छ के नाम से प्रसिद्ध था।

यह एरिकच्छ दैत्याराज हिरणाकश्यप की राजधानी थी। हिरणाकश्यप को यह वरदान प्राप्त था कि वह न तो दिन में मरेगा और न ही रात में तथा न तो उसे इंसान मार पायेगा और न ही जानवर। इसी वरदान को प्राप्त करने के बाद खुद को अमर समझने वाला हिरणाकश्यप निरंकुश हो गया लेकिन इस राक्षसराज के घर जन्म हुआ प्रहलाद का।

भक्त प्रहलाद की नारायण भक्ति से परेशान होकर हिरणाकश्यप ने उसे मरवाने के कई प्रयास किए फिर भी प्रहलाद बच गया आखिरकार हिरणाकश्यप ने प्रहलाद को डिकोली पर्वत से नीचे फिकवा दिया। डिकोली पर्वत और जिस स्थान पर प्रहलाद गिरा वह आज भी मौजूद हैए जिसका जिक्र श्रीमद भागबत पुराण के नौवे स्कन्ध मे व झाँसी गजेटियर पेज 339ए 357 मे मिलता है।

पौराणिक कथाओ के अनुसार हिरणाकश्यप की बहिन होलिका ने प्रहलाद को मारने की ठानी। होलिका के पास एक ऐसी चुनरी थी जिसे पहनने पर वह आग के बीच बैठ सकती थी जिसको ओढ़कर आग का कोई असर नहीं पढ़ता था। होलिका वही चुनरी ओढ़ प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई लेकिन भगवान की माया का असर यह हुआ कि हवा चली और चुनरी होलिका के ऊपर से उडकर प्रहलाद पर आ गई इस तरह प्रहलाद फिर बच गया और होलिका जल गई।

इसके तुंरत बाद विष्णु भगवान ने नरसिंह के रूप में अवतार लिया और गौधुली बेला यानी न दिन न रात में अपने नाखूनों से डिकौली स्थित मंदिर की दहलीज पर हिरणाकश्यप का वध कर दिया। हिरणाकश्यप के वध के बाद एरिकच्छ की जनता ने एक दूसरे को खुशी में कीचड डालना शुरू कर दिया और यहीं से होली की शुरुआत हो गई।

होली के इस महापर्व पर कई कथानकों के सैकड़ों प्रमाण हैं जोकि बुंदेलखंड के एरच के निकट मे स्थित डिकोली पर्वत यानि डीकांचल पर्वत तो प्रहलाद को फेंके जाने की कथा बयां करता ही है। बेतवा नदी का शीतल जल भी प्रहलाद दुय यानि नारायण भक्तप्रहलाद के स्म्रति चिन्ह को हर पल स्पर्श कर खुद को धन्य समझता हैए होलिका के दहन का स्थान हिरणाकश्यप के किले के खंडहर और ग्राम डिकौली में सैकड़ों साल पुराने छिन्नमस्ता देवीमंदिर व नरसिंह मंदिर सभी घटनाओं की पुष्टि करते हैं।

इसके साथ ही यहा खुदाई में मिली है प्रहलाद को गोद में बिठाए होलिका की अदभुत मूर्ति हजारों साल पुरानी यह मूर्ति शायद इस ग्राम डिकोली की गाथा बयां करने के लिए ही निकली है। प्रसिद्ध साहित्यकार हरगोविंद कुशवाहा के मुताबिक हिरणाकश्यप तैंतालीस लाख वर्ष पूर्व एरिकच्छ में राज्य करता था। बुंदेलखंड का सबसे पुराना नगर एरच ही है। श्रीमद भागवत के दूसरे सप्तम स्कन्ध के दूसरे से नौवें और झांसी के गजेटियर में पेज संख्या तीन सौ उन्तालीस में भी होली की शुरुआत से जुड़े प्रमाण दिए गए है।

इसके साथ ही इस नगरी में अब भी खुदाई में हजारो साल पुरानी ईंटों का निकलना साफ तौर पर इसकी ऐतिहासिकता साबित करता है। जब इस नगरी ने पूरी दुनिया को रंगों का त्यौहार दिया हो तो यहा के लोग भला होली खेलने में पीछे क्यों रहे।

लोकगीतों की फागों से रंग और गुलाल का दौर फागुन महीने से शुरू होकर रंगपंचमी तक चलता है। ठेठ बुन्देली अंदाज में लोग अपने साजो और सामान के साथ फाग गाते हैं। इसी के साथ महसूस करते हैं उस गर्व को जो पूरी दुनिया को रंगों का त्यौहार देने वाले इस कस्बे के निवासियों में होना लाजमी है।

जिस तरह दुनिया के लोग ये नहीं जानते कि होली की शुरुआत झांसी से हुई उसी तरह दर्शकों को ये जानकर हैरानी होगी कि आज भी बुंदेलखंड में होली जलने के तीसरे दिन यानी दोज पर खेली जाती है क्योंकि हिरणाकश्यप के वध के बाद अगले दिन एरिकच्छ के लोगों ने राजा की मृत्यु का शोक मनाया और एकदूसरे पर होली की राख डालने लगे।


बाद में भगवान विष्णु ने दैत्यों और देवताओं के बीच सुलह कराई। समझौते के बाद सभी लोग एकदूसरे पर रंग.गुलाल डालने लगे इसीलिए बुंदेलखंड में होली के अगले दिन कीचड की होली खेली जाती है और रंगों की होली दोज के दिन खेली जाती है। यहां हर साल चैत माह की पूर्णिमा को विशाल प्राचीन मेले का आयोजन होता है जो कई पीडियो से होता आ रहा हैं


बुन्देलखण्ड का पवित्र स्थल एरच ही है जहां पृथ्वी पर मानव जीव को दिशा व दशा का ज्ञान हुआ। पुराणो के अनुसार एैसा माना जाता है कि हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकश्यप सतयुग के प्रथम शासक हुये जिन्होने पारब्रहा्र की इतनी तपस्या की कि उनके परिवार के लिये भगवान विष्णु को तीन अवतार धारण कर उन्हें मोक्ष प्रदान करना पडा। सभी जानते है कि सतयुग में केवल मत्स्य, कच्छप,वाराह व नरसिंह अवतार ही हुये जिनमें दो इसी खानदान के लिये हुये और त्रेता का प्रथम मानव अवतार वामन हुआ जो प्रहलाद के प्रपौत्र एवं वैरोचन के पुत्र राजा बलि से तीन पग धरती माँगने के लिये आये। आपको बता दे कि यह बुन्देलखण्ड की वह धरा जो सतयुगकाल की एैताहिसिक नगरी है जो बर्तमान मे प्रदेश की राजधानी लखनउ से 200 व झांसी से 70 किमी दूरी पर स्थित है बर्तमान समय मे यह क्षेत्र सैलानियो व पर्यटको के अलावा श्रद्धालुओं का केन्द्र वना हुआ है जहां से लाखों लोगेा का दिल जुडा हुआ है।

बौद्धिक दृष्टि एवं हिन्दु पौराणिक कथानुसार भगवान विष्णु की आज्ञानुसार ब्रहाा्र जी को सृष्टि की रचना करने का निर्देश मिला तो उन्होने सर्वप्रथम विष्णु द्वारा ही बध किये गये, उनके द्वारा ही उत्पन्न मधु कैटभ को मारकर पृथ्वी का सृजन किया गया। तत्पश्चात पृथ्वी के महत्वपूर्ण भाग जिसे जम्मूदीप भरत खण्डे कहा जाता है। व्यापार की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण क्षेत्र जिसे आजकल बुन्देलखण्ड कहते है, केा एक सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल हमारे बीच है जिसका जिक्र पदम पुराण के द्वितीय अध्याय में आता है इसे सनकादिक क्षेत्र भी कहा जाता है जहाँ पर ब्रहा्र के पुत्र सनक, सनन्दन, सनातन, सनत कुमार ने तपस्या की थी तथा विष्णु के दो द्वारपाल जय, विजय को श्रीमद् भागवत के स्कंध, सप्तम के अध्याय 1 में श्लोक संख्या 37,38 में उन्हे बैकुण्ठ में प्रवेश करने से रोक दिया गया था साथ ही उनको श्राप मिला था कि भौतिक जगह में वह असुरा के रूप में जन्म लेगे एवं तीन जन्मो तक उन्हे असुर रहना पडेगा। इसका संकेत मानस रचियता बाबा तुलसीदास ने यह कह दिया कि द्वार पाल हरि के प्रिय दोऊ "जय अरू विजय जानसब कोऊ" व उन्होने लिखा है कि "विप्र श्राप से दूनऊ भाई तामस असुर देह तिन पाई" से वर्णन किया गया है। आपकेा बता दे कि हिरण्याक्ष व हिरण्याकश्यप पृथ्वी के बुन्देलखण्ड के प्रथम शासक रहे। लोकोक्तियाँ भी इस कस्बे का परिचय देती है कहा जाता है कि नटवर चढै न बेडनी, एरच पकै न ईट, गुठनोंटा भोजन नही, बूंदी छपै न छीट, इसके अलावा कहा गया है कि भली भई सो न जरी, वैरोचन के साथ, मेरे सुत के सामने हरि पसारे हाथ.............अर्थात एरच में ईट पकाने की आवश्यकता नही है तथा हिरण्यकश्यप के प्रपौत वधू वैरोचन की पत्नी जब सती होने लगी तो लोगो ने उसे रोका और कहा कि तुम्हारे पुत्र के समक्ष ब्रहा्र भिखारी बनकर आने वाला है अतः उसने कहा कि मेरे पुत्र राजा बलि के समक्ष भगवान हाथ पसारकर तीन पग धरती मांग रहा है। इस प्रकार की आश्चर्य जनक घटनाये इस कस्बे में घटित हुयी। झाँसी जनपद के गजैटियर के पृष्ठ-559 में इसका विस्तृत विवरण दिया गया है एरच के बाद बुन्देलखण्ड का प्रसिद्ध नगर विदिशा (दशार्ण) भी शुंग वंश, मौरी वंश एवं महा जनपद काल एवं महाभारत का प्रसिद्ध नगर रहा।

बताते चले कि अग्नि पुराण केे गर्ग संहिता में उल्लेख मिलता है कि पूर्व काल में जब श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न इस देश के राजा शुभांग के देश में आये तो उन्होने राजा से पूंछा कि इसका नाम दशार्ण कैसे पडा तो राजा ने बताया कि भगवान नरसिंह द्वारा हिण्यकश्यप का वध किया और प्रहलाद दुःखित हुआ तो वे उसे उठाकर लाये और अपना प्रिय भक्त बताया। प्रहलाद के माता-पिता ईष्ट मित्रों की सेवा न करने की कहने पर भगवान नरसिंह के नेत्र जल से बने मंगलायतन तीर्थो में स्थान करोजिसेस कहे जाने वाले ऋणों से मुक्ति पाओगे।


दशार्ण में दशार्णपुर जिसका दूसरा नाम एडकाक्षपुरी यानि एरछ था। वहां जल स्थल से माल की आवक-जावक थछ आज भी एरच के किले के नीचे एक भग्नगोदी के निशान है जहां स्थानिय निवासियों ने कल्पना के तौर पर बताया कि यहां उस समय जलमार्ग द्धारा बडी नावों से व्यापार होता होगा। एरच के पुराव शेष में जो पकी हुई ईटें (इष्टिका) एवं सिक्के जिनमें अग्नि मित्र, दामित्र का उल्लेख मिलता है जिस पर लिखा है 'रजो वंश किस हाममिमस पोडरीक' एक इष्टिका पर लिखा है ''मेघ सर्व मेघवा (जिम) सर्व मेघ जो किसी यज्ञ का शेषांक है। शतनीक, आदितिमित्र, मूलमित्र आशाहमित्र, नामक शासकों का भी उल्लेख मिलता है अर्थात सतयुग में हिरण्यकश्यप हिरण्याक्ष त्रेता में प्रहलाद एवं उसके पुत्र वैरोचन व राजा बलि एवं द्वापर में अग्निपुराण का आख्यान इन सभी उदाहरणों से यह अब निर्विवाद प्रमाणित है कि एरच ही प्रथम राजधानी बुन्देलखण्ड की है। मौर्यकाल, गुप्तकाल, शंगकाल, प्रतिहारकाल के वाद चन्देल काल में परमार्दिदेव के वि.स. 1230 के महोबा में प्राप्त ताम्र लेख 18वें एरच का जिक्र एक प्रसिद्ध वैष्णव मंदिर को ध्वस्त कर उसके सेनापति मलिक काफूर ने एक मस्जिद का निर्माण कराया था। जिसमें लगी हुयी मूर्तियां एवं पत्थर इसकी याद ताजा करती है। सन् 1526 ई0 बाबर भी यहाँ रूका था जब व चंदेरी के खंगार राजा मेदिनी राय से युद्ध करने जा रहा था जिसके साथ रांणा-सांगा का युद्ध हुआ था और वह लडते-लडते इसी नगर एरच में शहीद हुए उनका मरण स्मारक आज उपेक्षित अवस्था में अपनी बदहाली पर रो रहा है।


छिन्नमस्ता देवी मंदिर ग्राम डिकौली एरच जिला झांसी उत्तर प्रदेश भारत

यह स्थान सतयुग में राजा हिरण्यकश्यप की राजधानी क्षेत्र हुआ करता था। भक्त प्रह्लाद और होलिका दहन के पश्चात भगवान नृसिंह का अवतार इसी स्थान पर माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु के इस अत्यंत भंयकर स्वरूप को मां महालक्ष्मीा भी सहन नहीं कर सकीं थीं इसलिये मां ने पीठ फेर ली थी। इस मंदिर में मां के विग्रह के स्थान पर एक प्रस्तर को उनकी पीठ मान कर पूजा जाता है। श्री अक्षरा देवी सिद्धनगर और मां रक्तदंता देवी सिद्धनगर के साथ देवी छिन्नमस्ता को शक्ति त्रिकोण का अंग माना जाता है। यह स्थान कभी तंत्र साधना का भी बड़ा केन्द्र रहा है। यह मदिर ह्जारो साल पुराना है जिस पर अज्ञात भाषा बर्णित है डिकोली एरच मे स्थित यह देवी मंदिर त्रेतायुग में गवाह रहा है हिरणाकश्यप की हैवानियत काए भक्त प्रह्लाद की भक्ति काए होलिका के दहन और नरसिंह के अवतार का। होली यानि रंगों के पर्व का प्रारंभ होलिका दहन का श्रेय दिया जाता है। हर साल चैत्र पूर्निमा को इस स्थान पर नेश्नल मेला का आयोजन किया जाता है।

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