UP ELECTION 2022

बरेली शहर और बरेली कैण्ट सीट सपा के हाथ आना मुश्किल

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बरेली शहर/कैण्ट सीटों का जायज़ा रुहेलखण्ड का बरेली ज़िला जिसमें दो लोकसभा और नौ विधान सभा हैं। लगभग 40 साल के अर्से में बरेली लोक सभा सीट पर सिर्फ़ दो बार ही जनता ने बदलाव किया जिसमें प्रवीण सिंह ऐरन को सांसद की कुर्सी मिली थी। आंवला सीट पर अकसर बदलाव होता रहा है कभी पार्टी के नाम पर तो कभी प्रत्याशी के चेहरे पर। अगर बात करें विधान सभा सीटों की तो लगभग सभी सीटों पर हर चुनाव में जनता ने बदलाव किया है। कांवर (मीरगंज) और कैण्ट सीट पर ही किसी चेहरे को दोबार मौक़ा मिला बाक़ी हर सीट पर चेहरा बदलता रहा है। ख़ैर फिलहाल बात करते हैं 18वीं विधान सभा के लिए हो रहे चुनावी दंगल की। 2017 में हुए चुनाव पर तो ईवीएम का दबदबा रहा इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। साथ ही सैक्यूलर के लबादे में छुपी कुछ पार्टियों का भी बीजेपी का परचम लहराने में बड़ा योगदान रहा था। फिलहाल बात करते है फरवरी 2022 में होने जा रहे चुनाव की। एक तरफ़ जहां लोग भ्रम पाले बैठे हैं कि अखिलेश सरकार बनेगी। तो दूसरी तरफ़ बरेली ज़िले की कई अहम सीटों को खुद खोने का क़दम उठाया है पार्टी नें। 124 बरेली शहर 125 बरेली कैण्ट सीट तो समाजवादी पार्टी के हाथ आती नहीं दिख रही इसकी बड़ी और इकलौती वजह है उम्मीदवारों के चेहरे। बरेली शहर सीट पर मज़बूत दावेदारों को किनारे करके पार्टी ने एक नया चेहरा उतारा है। इसी तरह 125 बरेली कैण्ट से बरेली की मेयर रह चुकी सुप्रिया ऐरन को टिकट देकर सीट खोने का पूरा इन्तेज़ाम अखिलेश यादव ने कर लिया है। अगर बात करें बरेली शहर सीट की तो पार्टी के लिए लगातार काम करने वाले डा० अनीस बेग कलीमुद्दीन जैसे मज़बूत दावेदारों को किनारे करके बिलकुल नये चेहरे को टिकट दिया इसी तरह बरेली कैण्ट सीट पर सबसे मज़बूत दावेदार अनुराग सिंह नीटू की कई साल की मेहनत पर पानी फेरकर कुछ घण्टे पहले पार्टी में दाखिल हुई सुप्रिया ऐरन को उतारा। इन हालात में ये दोनों ही सीटें पूरी तरह पार्टी के हाथ से फिसलती नज़र आ रही हैं। इसकी कई बड़ी वजह सामने हैं। पहली यह कि बरेली शहर सीट के लिए कई साल से मेहनत कर रहे डा० अनीस बेग और कलीमुद्दीन के समर्थकों में पार्टी से नाराज़गी का भरना। डा०अनीस बेग और कलीमुद्दीन ज़ाहिरी तौर पर भले ही पार्टी के नये नवेले उम्मीदवार को सपोर्ट करने की बात करते रहे लेकिन अन्दर से पार्टी की इस कारगुज़ारी से ना खुश हैं। ऐसे में थोपे गये नये चेहरे की हिमायत करने का सवाल ही नहीं पैदा होता। और स्वभाविक है कि जब ये खुद मन से सपोर्ट नहीं करेंगे तो इनके खास समर्थक भी पीछे ही हटे रहेंगे। कैण्ट सीट पर जहां अनुराग सिंह नीटू और नीटू के समर्थक चुनाव में किनारा कशी करते दिख रहे हैं। 125 बरेली कैण्ट सीट अखिलेश के हाथ ना आने की एक बड़ी वजह सुप्रिया ऐरन का चेहरा भी है। सुप्रिया ऐरन खुद पांच साल बरेली की मेयर रही लेकिन इस दौरान उन्होंने एक ईंट भी कहीं नहीं लगवाई। हालांकि लगभग नौ साल गुज़र गये सुप्रिया को मेयर सीट से हटे हुए। एक तरफ़ बीजेपी की तरफ़ से गढ़े मुर्दे उखाड़कर वोटरों की याद ताज़ा की जा रही है तो दूसरी तरफ़ पार्टी की ही भीतरघात भी सक्रिय हो चुकी है।साथ ही कैण्ट सीट पर कांग्रेस ने भी काफ़ी मज़बूत उम्मीदवार हाजी इस्लाम बब्बू को उतारकर सुप्रिया की राह में बड़ा रोड़ा अटका दिया है हालांकि कांग्रेस के नाम पर तो वोट मिलने वाले नहीं हैं लेकिन इस्लाम बब्बू का चेहरा काफ़ी असर करेगा। इन हालात में कैण्ट सीट भी सपा के हाथ आती नहीं दिख रही। हांलाकि मीरगंज में पार्टी अच्छा प्रदर्शन करती दिख रही है जबकि भोजीपुरा सीट पार्टी को मिलने के मज़बूत हालात नज़र आ रहे हैं क्योंकि भोजीपुरा अंसारी बाहुल्य सीट है और शहजिल इस्लाम भी अंसारी बिरादरी से हैं इसलिए बिरादरी वाद पूरी तरह हावी रहेगा दूसरी बड़ी वजह बहोरनलाल मौर्या की कारगुज़ारियों के चलते बीजेपी का वोट बैंक ही बहोरनलाल के खिलाफ़ जाता दिख रहा है इसकी झलक एवीएन नेटवर्क आपको दिखा चुका है साथ ही मुस्लिम वोट शहजिल इस्लाम से नाखुश होते हुए भी बीजेपी को रोकने की नासमझी के चलते शहजिल के पक्ष में ही जाने पर मजबूर दिख रहा है। इन हालातों के साथ ही ईवीएम के चमत्कार को भी याद रखना ज़रुरी है।