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मुसलमान खुद ज़िम्मेदारी है ग़ुलाम बनकर जीने का

दरी बिछाने की आदत हो गई है मुसलमान की - इमरान नियाज़ी ग़ुज़रे 75 साल के अर्से के दौरान मुसलमान की सामाजिक आर्थिक शैक्षित हालत में सुधार नहीं आ सका। इसकी वजह खुद मुसलमानों की खोपड़ी ही है। नतीजा 1990 के बाद से वो लोग मुसलमान पर हावी होने लगे जिनकी सिर उठाकर बात करने की भी औक़ात नहीं थी। मैं खुद मुस्लिम हूं इसलिए मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं कि "मेरी क़ौम भैंसा खाती है इसलिए भैंसे वाली खोपड़ी हो गई है। जब जब हमला होता है तब तब सरकार और आसतीन के सांप पार्टियों को कोसने लगते हैं और कुछ ही वक्त के बाद फिर उन्हीं सांपों को दूध पिलाने में मस्त हो जाते हैं मुस्लिम। मुसलमान के ज़मीर और खुददारी को मार देने में सबसे बड़ा हाथ मुल्लाओं और मियांओं का है। मुल्ला और मियां अपनी दुकाने चलाने और क़ौम के माल पर ऐश करते रहने के लिए क़ौम को मुसलमान बनने ही नहीं देते। मुल्लाओं ने क़ौम को वहाबी देवबन्दी बरेलवी अहले हदीस सुन्नी में बांट रखा है तो मियांओं ने चिश्ती सकलैनी मदारी रज़वी वारसी शेरी में बांट दिया है। ये लोग चाहते ही नहीं कि पूरी क़ौम सिर्फ़ मुसलमान बनकर एक प्लेटफ़ार्म पर आए। मामला चाहे मुसलमानों के सामाजिक हालात का हो या एकोनॉमी और एजूकेशन का हो। मुल्ला और मियां चाहते हैं कि मुसलमान हर मामले में कमज़ोर रहे क्योंकि क़ौम की इसी कमज़ोरी के चलते इनकी दुकानें आबाद हैं। जिस दिन क़ौम फ़िर्क़ा वारियत और सिलसिलाई अदावतों की ज़ंजीरों से आज़ाद होकर मुसलमान बन गई उसी रोज़ जहां एक तरफ़ मुल्लाओं और मियांओं के ऐशो आराम ख़त्म हो जायेंगे तो वहीं सियासी पार्टियों की दुकाने भी पूरी तरह बन्द हो जायेंगी। मुल्लाओं और मियाओं ने फ़िर्क़ा वारियत और अब कुछ अर्से से सिलसिलाई अदावतों को इस हद तक फैला दिया है कि क़ौम पूरी तरह जहालत की दलदल में धस चुकी है। क़ौम की इसी जहालत का फायदा ले रही हैं सियासी जमातें। अगर बात करें कांग्रेस की तो कांग्रेस ने बंटवारा कराने के बाद से आज तक मुसलमानों को सिर्फ़ ठगा ही है। मामला चाहे निज़ाम हैदराबाद के हज़ारों लोगों को लाईन में खड़ा करके फौज की गोलियों से भुनवाने का हो या मुरादाबाद ईदगाह में नमाज़ियों पर पीएसी से गोली चलवाने का। चाहे बाबरी मस्जिद के ताले खोलकर पूजा शुरु कराने की करतूत हो या गुजरात आतंक के मास्टर माईण्ड को सम्मान पुरुस्कार देने की। या नानावटी आयोग की रिपोर्ट दबाने की हरकत हो या छत्तीसगढ़ में मुस्लिम बस्तियां जलाने की। हर मामले में कांग्रेस ने मुसलमानों के साथ दगा ही की है। सैकड़ों बार धोका उठाने के बावजूद मुसलमानों का मुर्दा हो चुका ज़मीर हरकत में नहीं आता और मुसलमान लगातार कांग्रेस की दुम पकड़कर ही जी रहा है। कांग्रेस की ही वर्किंग कमेटी थी जिसने 1948 में मुसलमान को प्रधानमंत्री डिफैन्स मिनिस्टर और वित्त मंत्री ना बनाये जाने का बिल पास किया था जिसके नतीजे के तौर पर देश का बंटवारा हुआ। अब अगर बात करें समाजवादी पार्टी की तो समाजवादी पार्टी ने मुसलमान को क्या दिया ? कभी ग्रह मंत्री वित्त मंत्री या उप मुख्य मंत्री नहीं बनाया। सपा के दौर में लगातार पुलिस पीएसी की भर्तियां की गई एक फीसद भी मुसलमान भर्ती नहीं किये गये। कहीं पार्टी का ज़िलाध्यक्ष तक मुसलमान नहीं बनाया गया। पार्टी के बड़े पद हों या पुलिस पीएसी की भर्ती सब में बिरादरी विशेष का ही बोलबाला रखा गया। मुसलमान को थमाई गई सिर्फ रिक्शा। हाल ही में चुनावी सरगर्मी के तहत सपा से मजलिस के गठबन्धन की चर्चा चली। लेकिन जब बैरिस्टर असद उददीन ओवेसी ने भागीदारी की बात की तो मुसलमानों की चहेते अखिलेश यादव नें क़दम पीछे हटा लिए। अफ़सोस यह है कि क़ौम जहालत की दलदल में है अखिलेश वादी मुसलमानों को ना मुजफ्फरनगर याद है ना महाराष्ट्र के फारूख़ कुरैशी का अपमान मालूम है अंध भक्ती ने पूरी तरह गांधी के बन्दर बना दिया है। इन दिनों कर्नाटक में मुस्लिम लड़कियों के हिजाब को लेकर आतंक मचाया जा रहा है दुनिया भर में मुददा गर्मा रहा है लेकिन ना समझ मुसलमानों के नाखुदा राहुल अखिलेश माया पर सन्नाटा छाया हुआ है यहां तक कि "लड़की हूं लड़ सकती हूं" का शिगूफ़ा छोड़ने वाली प्रियंका गांधी भी कोमा मे है प्रियंका की सारी तीरन्दाज़ी हिजाब के नाम पर आवाज़ ही बन्द हो गई है। अगर मुसलमान इज़्ज़त से जीना चाहते हैं अपने और अपनी नस्ल के वजूद को बचाना चाहते है आने वाली नस्लों को ग़ुलामी की ज़ंजीरों मे जकड़ने से बचाना चाहते हों तो गौर करें आस्तीन में सांप पालना बन्द करें अपनी पहचान बनाये। वरना मिटने की कगार पर ही खड़ी है कौम।