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कम से कम जम्हूरियत में इतनी आजादी तो है-हमको खुद करना है अपने कातिल का इन्तेखाब

गुलाम "लोक" से रोजी की भीक मांगता मालिक "तंत्र" 15 अगस्त 1947 को गांधी ने कहा था कि अब हमारा लोकतन्त्र बनेगा। मतलब गांधी ने लोगों को बताया था कि लोक के के खून पसीने की कमाई से तन्त्र ऐश करेगा। लोक अब विदेशियों की गुलामी में नहीं रहा अब उसको देसियों का गुलाम बनाया दिया गया है। बस उसी क्षण से भारत को लोक ब्रिटिशों की गुलामी से छूटकर देसियों की गुलामी में आ गया। "लोक" मतलब भारत के वो लोग जो दिन रात मेहनत करके अपनी जीविका चलाते हैं ब्रिटिशों के कब्जे से देश को निकालने के जिए अपना खून दिया चैन दिया यहां तककि उनके परिवार के परिवार भेंट चढ़ा दिये, और "तन्त्र" वो लोग जिन्होंने ब्रिटिशों को आजादी के परवानों के ठिकाने बताकर उनपर गोलियां बरसवाई गिरफ्तार करायाए फांसी पर लटकवाया और अब खुद उन्हीं देश वासियों को लूट लूटकर माल विदेशों में जमा करें, गुलाम गरीब "लोक" की खून पसीने की गाढ़ी कमाई से जिनके परिवार देश विदेश में गुलछररे उड़ायें, ऐसे लोगों की टीम तन्त्र कहलाती है। यानी जहां गुलाम को गुलामी में ही जीने पर मजबूर रखा जाये और ब्रिटिशों के एजेण्टों, देश का माल उड़ाने वालों, अपने आतंकी गैंग से सामूहिक नरसंहार कराने वालों को नियम कानून की तमाम पाबन्दियों से आजाद रखकर मनमानी करने की खुली छूट मिले लोगों के हाथ में देश की बागडोर रखी जाने की पद्धति को ही लोकतन्त्र कहा जाता है। यही है भारत को महान लोकतन्त्र। ऐसा भी नहीं है कि साल के सभी तीन सौ पैंसठ दिन "लोक" गुलाम ही रखा जाता हो, साल भर में कमो बेश एक महीने के लिए लोक को इज्जतदार और शक्तियां दी जाती हैं ये शष्क्ति केवल वोट डालने तक ही सीमित रखी जाती है इसके अलावा लोक को उसकी ओकात पर ही रखा जाता है साथ ही वोट देने की शश्क्ति का प्रयोग भी लाठी दिखाकर कराया जाता है। गुलाम लोक से रोजगार देने की भीख मांगने हर दिन एक न एक तन्त्र आता है लेकिन गुलाम लोक की क्या औकात कि तन्त्र के मंच के करीब तक फटक सके, एक कदम भी गुलाम ने आगे बढ़ाने की कोशिश की तो तुरन्त सुरक्षा के बहाने उसे उसकी गुलामी का एहसास कराने के लिए लठिया दिये जाने का कानून है महान लोक - तन्त्र का। एक बार फिर गुलाम वोटर मतदान होने तक के लिए काफी इज्जतदार और कीमती माने जाने लगे। गुलाम भी मोहल्ले, गांव बस्ती के दलालों के चुंगल में आसानी से फंस कर "तन्त्र" नामक सांप को दूध पिलाने के लिए कड़ी धूप में लम्बी लम्बी कतारों में खड़े होंगे, वहां भी तन्त्र के जीवनों की बागडोर संभालने वाली 15 अगस्त 1947 को खादी के साथ साथ आजाद की जानी वाली वर्दी की लाठियों का नाश्ता करने पर मजबूर होंगे। हो भी रहा है गुलामों के साथ ऐसा ही। इस बार बड़ी ही जोर शोर से चुनाव आयोग प्रचार कर रहा है कि वोट जरूर दें यह आपका फर्ज है...। कैसा फर्ज ? यही कि गुलाम जिसको वोट देकर मालामाल बनने का मौका दें उन्ही के इषारों पर कत्ल किये जाये आबरूयें लुटवायें, जेलों में सड़ें, पुलिसिया जुल्म का षिकार बनाये जाये। किसी अफसर के पास किसी काम से जाये तो सरकारी चमचागीरी में मीडीया उन्हें "फरयादी" कहे। दरअसल वोट देना गुलामों का न तो फर्ज है और न ही षैक। वोट देना गुलामों की मजबूरी है। वोट नहीं देगें तो जो हार गया उसके गुण्डों के हाथों आबरूयें लुटाना पड़ेगी, कत्ल होना पड़ेगा, पिटना पड़ेगा, घर दुकान से बेदखल होना पड़ेगा और जो जीत गया उसके इशारों पर पुलिसिया जुल्म का शिकार बनना तय है, इन हालात में गुलाम वोटर करें तो क्या करें। आखिर गुलाम हैं गुलामी तो करना ही है। गुलाम वोटर सिर्फ इसी पर बेहद खुश हो जाते है कि कम से कम चुनावों के दौरान तो उन्हें इज्जतदार और इंसान समझा जाता है, कम से कम "तन्त्र" गुलामों से मीठी मीठी बाते तो कर ही लेता है, कम से कम "तन्त्र" के रोजगार दाता गुलाम वोटरों से "तन्त्र" की जान को खतरा तो नहीं रहता, जब "तन्त्र" गुलामों के दरवाजों पर रोजगार की भीख मांगने पहुंचते हैं तो उस वक्त गुलामों को चोर उचक्कों की श्रेणी में रखकर तलाशि यां तो नहीं ली जाती, कम से कम "तन्त्र" की सभा में पहुंचने के लिए गुलाम वोटरों खासकर महिला गुलामों को हजारों लोगों के सामने अपने शरीर की तला शी तो नहीं देनी पड़ती। मतदान निबटने के साथ ही गुलामों को उनकी असल ओकात बताने का सिलसिला षुरू हो जाता है गुलामों में मतदान के नतीजे जानने का शौक होता है मतगणना स्थल पहुंचते हैं वहां ‘‘ तन्त्र ’’ की जीवन रक्षक लाठियां गुलामों के स्वागत के लिए तैयार रहती है और कुछ कुछ देर के बाद स्वागत करती भी रहती हैं। गुलाम "लोक" देश के बेरोजगार मालिक "तन्त्र" को अपना वोट देकर करोड़ों कमाने वाला रोजगार दे देगें, बस इवीएम का बटन दबने के साथ ही गुलाम लोक अपनी असल औकात पर पहुंचा दिया जायेगा। और यहीं से शुरू हो जाती है तन्त्र के मनमानी करने ओर मालामाल बनने का सफर। चाहे राष्ट्रपति चुनने का मामला हो या गुलाम लोक के खून पसीने की कमाई को भत्ते का नाम देकर उसमें बढ़ौत्तरी करके मालामाल बनने का, मुख्य मार्गों पर सरकारी हफ्ता वसूली को कानूनी शक्ल देने की मनमानी हो या फिर सुरक्षा की बात हो तन्त्र नामक एक शख्स की जानमाल लाखों गुलाम लोक की जानमाल से ज्यादा कीमती माने जाने का कानून बनाने की या फिर कानून की मदद लेने की। सब कुछ तन्त्र की सहूलत, और फायदे के हिसाब से किया जायेगा। गुजरे 65 साल से तन्त्र ने कभी भी देसियों के गुलाम लोक के लिए सोचा तक नहीं, जब किया जो किया तन्त्र ने अपने और अपने परिवार के फायदे का काम किया। जिस तन्त्र को गुलाम लोक वोट की भीख देकर मालामाल बनने का मौका देते हैं वही तन्त्र उसी गुलाम लोक का कत्लेआम कराने से नही झिझकता। किसी ने शायद ठीक ही कहा है कि- कमसे कम जम्हूरियत में इतनी आजादी तो है-हमको खुद करना है अपने कातिल का इन्तेखाब। बस यही है लोकतन्त्र।